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Saturday, 16 April 2011

Is it possible to do away with Caste System in India


Higher Caste Person beats Low Caste Person
Caste system is known in Hindi (Indian language) as Jati (Caste) Jo Jatee Nahi (is eternal). Not that caste system is new thing to the world. It always exists everywhere. However, there is a great difference in caste system followed in India and all other countries in the world. In India caste is related to 'Roti' and 'Beti'. This means eating together and marriages are decided based on caste of a person.

वेदीक काल में जाति व्यवस्था नही थी। हिंदी में जानने के लिये नीचे स्क्रोल करें।
In certain castes 'Roti' is allowed with people from other castes but 'Beti' is strictly within the caste itself. In many cases there are division of caste in to sub castes. Among sub castes 'Roti' is allowed but not 'Beti'. This is not only true for Hindu religion but also for other religions like Islam and Christen. Social workers have tried their the best but have failed miserably. Politicians have never tried to do away with this dark spot so far. In fact it suits them in getting votes in election based on caste. Election analyses before and after election does predict and confirm effect of caste of voters. This is found to be a bigger obstacle in progress of nation than any other short coming. Is there any way to do away with this system? Education has some effect on this system. However, it is not widely accepted by the society. There is need to find a solution though.

In India there is reservation in various fields like education and employment. There are the government schemes for a particular caste or religion. There is tension among society due to this reservation. Some caste which are not given any reservation in education complain that admission for a particular course could not be obtained in spite of scoring say 90% marks and on other hand a particular person got admission although he/she scored only 70% marks. A student can't understand history of reservation while thinking about admission. He/she only knows that admission could not be secured because of reservation. The fundamental problem remains that each and every student cannot get admission. Even if reservation is done away with there shall be students who obtained say 85% marks and could not get admission for a preferred course of education. The basic reason is a student from a certain caste with his/her background cannot score more although he/she is equally intelligent. Therefore, reservation had been thought as a method to improve certain castes which are lagging behind the society in fields of education and employment. In my opinion this evil can be used as an advantage to do away with caste system.

Reservation policy should be changed. The reservation should be based on caste of candidate's grand parents or great grand parents rather than caste of the candidate. If parents of a person belong to different caste the person should not be assigned with any caste. For the purpose of reservation caste of any of the grand (or great grand) parents must be considered. This means a person from a particular caste does not fall in the reserved category can make a provision of reservation for his/her children. A person must be allowed to claim reservation based on caste of his/her mother/father/grand mother/grand father/ great grand mother/great grand father. If any one of them belongs to a caste which is recognised for reservation the person shall be eligible for reservation.

This would help in integrating society through marriage and reservation shall come to an end after say 4 generations. Physical time shall depend on how quickly integration takes place.



अनुवादकसुश्री मृदुला

वेदीक काल में जाति व्यवस्था नही थी।  
   हम वेदों में श्रम का सर्वोच्च महत्त्व पाते हैं | हमने देखा कि आर्यों के चाकर या आदि निवासी समझे गए दास दस्यु या राक्षस वस्तुतः अपराधियों के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पर्यायवाची शब्द हैं | प्रत्येक सभ्य समाज ऐसे अपराधियों पर अंकुश लगाता है | हम यह भी देख चुके हैं कि वेदों में सभी चार वर्णों को जिनमें शूद्र भी शामिल हैं, आर्य माना गया है और अत्यंत सम्मान दिया गया है | यह हमारा दुर्भाग्य है कि वेदों की इन मौलिक शिक्षाओं को हमने विस्मृत कर दिया है, जो कि हमारी संस्कृति की आधारशिला हैं | और जन्म-आधारित जाति व्यवस्था को मानने तथा कतिपय शूद्र समझी जाने वाली जातियों में जन्में व्यक्तियों के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार आदि करने की गलत अवधारणाओं में हम फँस गए हैं |
  कम्युनिस्ट और पूर्वाग्रह ग्रस्त भारतीय चिंतकों की भ्रामक कपोल कल्पनाओं ने पहले ही समाज में अलगाव के बीज बो कर अत्यंत क्षति पहुंचाई है | अभाग्यवश दलित कहे जाने वाले लोग खुद को समाज की मुख्य धारा से कटा हुआ महसूस करते हैं, फलतः हम समृद्ध और सुरक्षित सामाजिक संगठन में नाकाम रहे हैं | इस का केवल मात्र समाधान यही है कि हमें अपने मूल, वेदों की ओर लौटना होगा और हमारी पारस्परिक (एक-दूसरे के प्रति) समझ को पुनः स्थापित करना होगा | इस लेख में हम वेदों में जाति व्यवस्था की वास्तविकता और शूद्र के यथार्थ अर्थ का आकलन करेंगे |
१.  वेदों में मूलतः ब्राहमण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र पुरुष या स्त्री के लिए कहीं कोई बैरभाव या भेदभाव का स्थान नहीं है |
२. जाति (caste) की अवधारणा यदि देखा जाए तो काफ़ी नई है | जाति (caste) के पर्याय के रूप में स्वीकार किया जा सके या अपनाया जा सके ऐसा एक भी शब्द वेदों में नहीं है | जाति (caste) के नाम पर साधारणतया स्वीकृत दो शब्द हैं — जाति और वर्ण | किन्तु सच यह है ये  पूर्णतया भिन्न अर्थ रखते हैं | शायद जाति (caste) की अवधारणा यूरोपियन दिमाग की उपज है जिसका तनिक अंश भी वैदिक संस्कृति में नहीं मिलता | शायद  जाति का अर्थ है उद्भव के आधार पर किया गया वर्गीकरण | न्याय सूत्र यही कहता है “समानप्रसवात्मिका जाति:” अथवा जिनके जन्म का मूल स्त्रोत समान हो (उत्पत्ति का प्रकार एक जैसा हो) वह एक जाति बनाते हैं | ऋषियों द्वारा प्राथमिक तौर पर जन्म-जातियों को चार स्थूल विभागों में बांटा गया है – उद्भिज(धरती में से उगने वाले जैसे पेड़, पौधे,लता आदि), अंडज(अंडे से निकलने वाले जैसे पक्षी, सरीसृप आदि), पिंडज (स्तनधारी- मनुष्य और पशु आदि), उष्मज (तापमान तथा परिवेशीय स्थितियों की अनुकूलता के योग से उत्त्पन्न होने वाले – जैसे सूक्ष्म जिवाणू वायरस, बैक्टेरिया आदि) | हर जाति विशेष के प्राणियों में शारीरिक अंगों की समानता पाई जाती है | एक जन्म-जाति दूसरी जाति में कभी भी परिवर्तित नहीं हो सकती है और न ही भिन्न जातियां आपस में संतान उत्त्पन्न कर सकती हैं | अतः ( इस लिये ऐसा माना जाता है) जाति ईश्वर निर्मित है | जैसे विविध प्राणी हाथी, सिंह, खरगोश इत्यादि भिन्न-भिन्न जातियां हैं | इसी प्रकार संपूर्ण मानव समाज एक जाति है | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र किसी भी तरह भिन्न जातियां नहीं हो सकती हैं क्योंकि न तो उनमें परस्पर शारीरिक बनावट (इन्द्रियादी) का भेद है और न ही उनके जन्म स्त्रोत में भिन्नता पाई जाती है | बहुत समय बाद जाति शब्द का प्रयोग किसी भी प्रकार के वर्गीकरण के लिए प्रयुक्त होने लगा | और इसीलिए हम सामान्यतया विभिन्न समुदायों को ही अलग जाति कहने लगे | जबकि यह मात्र व्यवहार में सहूलियत के लिए हो सकता है | सनातन सत्य यह है कि सभी मनुष्य एक ही जाति हैं | वर्ण – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिए प्रयुक्त किया गया सही शब्द – वर्ण है – जाति नहीं | सिर्फ यह चारों ही नहीं बल्कि आर्य और दस्यु भी वर्ण कहे गए हैं | वर्ण का मतलब है जिसे वरण किया जाए (चुना जाए) | अतः जाति ईश्वर प्रदत्त है जबकि वर्ण अपनी रूचि से अपनाया जाता है | जिन्होंने आर्यत्व को अपनाया वे आर्य वर्ण कहलाए और जिन लोगों ने दस्यु कर्म को स्वीकारा वे दस्यु वर्ण कहलाए | इसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण कहे जाते हैं | इसी कारण वैदिक धर्म ‘वर्णाश्रम धर्म’ कहलाता है | वर्ण शब्द का तात्पर्य ही यह है कि वह चयन की पूर्ण स्वतंत्रता व गुणवत्ता पर आधारित है |
३. बौद्धिक कार्यों में संलग्न व्यक्तियों ने ब्राहमण वर्ण को अपनाया है | समाज में रक्षा कार्य व युद्धशास्त्र में रूचि योग्यता रखने वाले क्षत्रिय वर्ण के हैं | व्यापार-वाणिज्य और पशु-पालन आदि का कार्य करने वाले वैश्य तथा जिन्होंने इतर सहयोगात्मक कार्यों का चयन किया है वे शूद्र वर्ण कहलाते हैं | ये मात्र आजीविका के लिए अपनाये जाने वाले व्यवसायों को दर्शाते हैं, इनका जाति या जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है |
४. वर्णों को जन्म आधारित बताने के लिए ब्राह्मण का जन्म ईश्वर के मुख से हुआ, क्षत्रिय ईश्वर की भुजाओं से जन्में, वैश्य जंघा से तथा शूद्र ईश्वर के पैरों से उत्पन्न हुए यह सिद्ध करने के लिए पुरुष सूक्त के मंत्र प्रस्तुत किये जाते हैं | इस से बड़ा छल नहीं हो सकता, क्योंकि –
(a) वेद ईश्वर को निराकार और अपरिवर्तनीय वर्णित करते हैं | जब परमात्मा निराकार है तो इतने महाकाय व्यक्ति का आकार कैसे ले सकता है ? (देखें यजुर्वेद ४०.८)
(b) यदि इसे सच मान भी लें तो इससे वेदों के कर्म सिद्धांत की अवमानना होती है | जिसके अनुसार शूद्र परिवार का व्यक्ति भी अपने कर्मों से ब्राह्मण या क्षत्रिय या वैश्य बन सकता है। इतनाही नही अगला जन्म किसी राजपरिवार में पा सकता है | परन्तु यदि शूद्रों को पैरों से जन्मा माना जाए तो वही शूद्र पुनः ईश्वर के हाथों से कैसे उत्त्पन्न होगा?
(c) आत्मा अजन्मा है और समय से बद्ध नहीं (नित्य है) इसलिए आत्मा का कोई वर्ण नहीं होता | यह तो आत्मा द्वारा मनुष्य शरीर धारण किये जाने पर ही वर्ण चुनने का अवसर मिलता है | तो क्या वर्ण ईश्वर के शरीर के किसी हिस्से से आता है? आत्मा कभी ईश्वर के शरीर से जन्म तो लेता नहीं तो क्या ऐसा कहा जा सकता है कि आत्मा का शरीर ईश्वर के शरीर के हिस्सों से बनाया गया? किन्तु वेदों की साक्षी से प्रकृति भी शाश्वत है और कुछ अणु पुनः विभिन्न मानव शरीरों में प्रवाहित होते हैं | अतः यदि परमात्मा सशरीर मान ही लें तो भी यह असंभव है किसी भी व्यक्ति के लिए की वह परमात्मा के शरीर से जन्म ले |
(d) जिस पुरुष सूक्त का हवाला दिया जाता है वह यजुर्वेद के ३१ वें अध्याय में है साथ ही कुछ भेद से ऋग्वेद और अथर्ववेद में भी उपस्थित है | यजुर्वेद में यह ३१ वें अध्याय का ११ वां मंत्र है | इसका वास्तविक अर्थ जानने के लिए इससे पहले मंत्र ३१.१० पर गौर करना जरूरी है | वहां सवाल पूछा गया है – मुख कौन है?, हाथ कौन है?, जंघा कौन है? और पाँव कौन है? तुरंत बाद का मंत्र जवाब देता है – ब्राहमण मुख है, क्षत्रिय हाथ हैं, वैश्य जंघा हैं तथा शूद्र पैर हैं |
यह ध्यान रखें की मंत्र यह नहीं कहता की ब्राह्मण मुख से “जन्म लेता” है … मंत्र यह कह रहा है की ब्राह्मण ही मुख है | क्योंकि अगर मंत्र में “जन्म लेता” यह भाव अभिप्रेत होता तो “मुख कौन है?” इत्यादि प्रश्नों का उत्तर देने की आवश्यकता ही नहीं थी |
उदाहरणतः यह पूछा जाए, “दशरथ कौन हैं?” और जवाब मिले “राम ने दशरथ से जन्म लिया”, तो यह निरर्थक जवाब है | इसका सत्य अर्थ है – समाज में ब्राह्मण या बुद्धिजीवी लोग समाज का मस्तिष्क, सिर या मुख बनाते हैं जो सोचने का और बोलने का काम करे | बाहुओं के तुल्य रक्षा करने वाले क्षत्रिय हैं, वैश्य या उत्पादक और व्यापारीगण जंघा के सामान हैं जो समाज में सहयोग और पोषण प्रदान करते हैं (ध्यान दें ऊरू अस्थि या फिमर हड्डी शरीर में रक्तकोशिकाओं का निर्माण करती हैं और सबसे सुदृढ़ हड्डी होती है ) | अथर्ववेद में ऊरू या जंघा के स्थान पर ‘मध्य’ शब्द का प्रयोग हुआ है | जो शरीर के मध्य भाग और उदर का द्योतक है | जिस तरह पैर शरीर के आधार हैं जिन पर शरीर टिक सके और दौड़ सके उसी तरह शूद्र या श्रमिक बल समाज को आधार देकर गति प्रदान करते हैं | इससे अगले मंत्र इस शरीर के अन्य भागों जैसे मन, आंखें इत्यादि का वर्णन करते हैं | पुरुष सूक्त में मानव समाज की उत्पत्ति और संतुलित समाज के लिए आवश्यक मूल तत्वों का वर्णन है | यह अत्यंत खेदजनक है कि सामाजिक रचना के इतने अप्रतिम अलंकारिक वर्णन का गलत अर्थ लगाकर वैदिक परिपाटी से सर्वथा विरुद्ध विकृत स्वरुप में प्रस्तुत किया गया है | ब्राह्मण ग्रंथ, मनुस्मृति, महाभारत, रामायण और भागवत में भी कहीं परमात्मा ने ब्राह्मणों को अपने मुख से मांस नोंचकर पैदा किया और क्षत्रियों को हाथ के मांस से इत्यादि ऊलजूलूल कल्पना नहीं पाई जाती है |
५. जैसा कि आधुनिक युग में विद्वान और विशेषज्ञ सम्पूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक होने के कारण हम से सम्मान पाते हैं इसीलिए यह सीधी सी बात है कि क्यों ब्राह्मणों को वेदों में उच्च सम्मान दिया गया है | वेदों में श्रम का भी समान रूप से महत्वपूर्ण स्थान है | अतः किसी प्रकार के (वर्ण व्यवस्था में) भेदभाव के तत्वों की गुंजाइश नहीं है |
६. वैदिक संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति जन्मतः शूद्र ही माना जाता है | उसके द्वारा प्राप्त शिक्षा के आधार पर ही ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य वर्ण निर्धारित किया जाता है | शिक्षा पूर्ण करके योग्य बनने को दूसरा जन्म माना जाता है | ये तीनों वर्ण ‘द्विज’ कहलाते हैं क्योंकि इनका दूसरा जन्म (विद्या जन्म) होता है | किसी भी कारणवश अशिक्षित रहे मनुष्य शूद्र ही रहते हुए अन्य वर्णों के सहयोगात्मक कार्यों को अपनाकर समाज का हिस्सा बने रहते हैं |
७. यदि ब्राह्मण का पुत्र विद्या प्राप्ति में असफल रह जाए तो शूद्र बन जाता है | इसी तरह शूद्र या दस्यु का पुत्र भी विद्या प्राप्ति के उपरांत ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ण को प्राप्त कर सकता है |यह सम्पूर्ण व्यवस्था विशुद्ध रूप से गुणवत्ता पर आधारित है | जिस प्रकार शिक्षा पूरी करने के बाद आज उपाधियाँ दी जाती हैं उसी प्रकार वैदिक व्यवस्था में यज्ञोपवीत दिया जाता था | प्रत्येक वर्ण के लिए निर्धारित कर्तव्यकर्म का पालन व निर्वहन न करने पर यज्ञोपवीत वापस लेने का भी प्रावधान था |
८. वैदिक इतिहास में वर्ण परिवर्तन के अनेक प्रमाण उपस्थित हैं, जैसे -
(a) ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे | परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की | ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है |
(b) ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे | जुआरी और हीन चरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये |ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया | (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९)
(c) सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए |
(d) राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.१.१४) अगर उत्तर रामायण की मिथ्या कथा के अनुसार शूद्रों के लिए तपस्या करना मना होता तो पृषध ये कैसे कर पाए?
(e) राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए | पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.१.१३)
(f) धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२)
(g) आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.२.२)
(h) भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए |
(i) विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |
(j) हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.३.५)
(k) क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.८.१) वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए| इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं |
(l) मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने |
(m) ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना |
(n) राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ |
(o) त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे |
(p) विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्र वर्ण अपनाया | विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया |
(q) विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया |
९. वेदों में ‘शूद्र’ शब्द लगभग बीस बार आया है | कहीं भी उसका अपमानजनक अर्थों में प्रयोग नहीं हुआ है | और वेदों में किसी भी स्थान पर शूद्र के जन्म से अछूत होने ,उन्हें वेदाध्ययन से वंचित रखने, अन्य वर्णों से उनका दर्जा कम होने या उन्हें यज्ञादि से अलग रखने का उल्लेख नहीं है |
१०. वेदों में अति परिश्रमी कठिन कार्य करने वाले को शूद्र कहा है (“तपसे शूद्रम”-यजु .३०.५), और इसीलिए पुरुष सूक्त शूद्र को सम्पूर्ण मानव समाज का आधार स्तंभ कहता है |
११. चार वर्णों से अभिप्राय यही है कि मनुष्य द्वारा चार प्रकार के कर्मों को रूचि पूर्वक अपनाया जाना | वेदों के अनुसार एक ही व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों में चारों वर्णों के गुणों को प्रदर्शित करता है | अतः प्रत्येक व्यक्ति चारों वर्णों से युक्त है | तथापि हमने अपनी सुविधा के लिए मनुष्य के प्रधान व्यवसाय को वर्ण शब्द से सूचित किया है | अतः वैदिक ज्ञान के अनुसार सभी मनुष्यों को चारों वर्णों के गुणों को धारण करने का पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए | यही पुरुष सूक्त का मूल तत्व है | वेद के वशिष्ठ, विश्वामित्र, अंगीरा, गौतम, वामदेव और कण्व आदि ऋषि चारों वर्णों के गुणों को प्रदर्शित करते हैं | यह सभी ऋषि वेद मंत्रों के द्रष्टा थे (वेद मंत्रों के अर्थ का प्रकाश किया) दस्युओं के संहारक थे | इन्होंने शारीरिक श्रम भी किया तथा हम इन्हें समाज के हितार्थ अर्थ व्यवस्था का प्रबंधन करते हुए भी पाते हैं | हमें भी इनका अनुकरण करना चाहिए | सार रूप में, वैदिक समाज मानव मात्र को एक ही जाति, एक ही नस्ल मानता है | वैदिक समाज में श्रम का गौरव पूर्ण स्थान है और प्रत्येक व्यक्ति अपनी रूचि से वर्ण चुनने का समान अवसर पाता है | किसी भी किस्म के जन्म आधारित भेद मूलक तत्व वेदों में नहीं मिलते | अतः हम भी समाज में व्याप्त जन्म आधारित भेदभाव को ठुकरा कर, एक दूसरे को भाई-बहन के रूप में स्वीकारें और अखंड समाज की रचना करें | हमें गुमराह करने के लिए वेदों में जातिवाद के आधारहीन दावे करनेवालों की मंशा को हम सफल न होने दें और समाज के अपराधी बनाम दस्युदासराक्षसों का भी सफ़ाया कर दें | हम सभी वेदों की छत्र-छाया में एक परिवार की तरह आएं और मानवता को बल प्रदान करें |
वेदों में कोई जाति व्यवस्था नहीं है |
अनुवादक – सुश्री मृदुला


Read original article in English at http://agniveer.com/888/caste-system/

3 comments:

माधव बामणे said...

09 फेब्रुवारी 2013
जाता जात नाही ती जात:
रविवार 03 फेब्रुवारी 2013 च्या पृष्ठ 7 वर वरील मथळ्याचा अशोक पानवलकर यांचा विशेष लेख वाचला. लेखात जरी निराशा असली तरी त्यांनी एक महत्वाचा मुद्दा पुढे आणण्याचा प्रयत्न केला आहे. त्यांच्या मते जात ही कायम आहे व कधीही जाणार नाही. राजकारणी जात सोडण्याला कधीही तयार होणार नाहीत. राजकारण्यांना जो पर्यंत जात हा निकष लावून मते मिळतात तो पर्यंत ते जातीचा उपयोग करत राहणार. सर्वसामान्यांनाही जातीचा व्यवहारात फायदा दिसतो. त्यांच्या भावना जाती विरुद्ध होतात पण केंव्हा? जेंव्हा आरक्षणाचा मुद्दा येतो तेंव्हा. इतर वेळेला कर्णाच्या बाजूने असलेले लोक सुद्धा आरक्षणाच्या विरोधात जातात. येथे पहा. (http://janahitwadi.blogspot.in/2012/08/no-one-can-choose-parents.html#more)) अंधश्रद्धा निर्मूलन संघटना (अंनिस) चे डॉ. नरेंद्र दाभोळकर यांच्या मते डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरानी सांगितलेले 3 उपाय म्हणजे संविधानाद्वारे घेतलेली सामजिक न्यायाची भूमिका, हिंदू धर्माची चिकित्सा आणि आंतरजातीय विवाह. डॉ. नरेंद्र दाभोळकर यांच्या मते (दै. सकाळ पृष्ठ 6 दिनांक 09-02-2013) हे तीन मुद्दे वेगळे दिसत असले तरी ते एकमेकात गुंफलेले आहेत. अंनिसचे आंतरजातीय विवाहासंबंधीचे प्रयत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरानी सांगितलेल्या तिन्ही उपायांचे अनुसारण होय. त्या मध्ये थोडे बदल त्यांनी सुचविले आहेत. ते म्हणजे अशा विवाहांना कायमस्वरुपी मदत व संरक्षण देणारे व्यासपीठ जिल्हापातळीवर असावे, असे व्यसपीठ पोलिस यंत्रणा निर्माण करू शकते, समाज प्रबोधनातून आंतरजातीय विवाहांना मान्यता मिळवून देणे, आंतरजातीय विवाह करणाऱ्या दाम्पत्याला दिली जाणारी आर्थिक मदत दुप्पट करणे, आंतरजातीय विवाहामुळे निर्माण होणाऱ्या दहशती विरुद्ध कायदे करुन त्यांची सत्त्वर अंमलबजावणी करणे, विवाह नोंदणी वधू-वराच्या गांवी करणे पुष्कळ वेळी धोक्याचे असते अशी नोंदणी जेथे लग्न होईल तेथेच करावी वगैरे. डॉ. नरेंद्र दाभोळकर यांच्या मते ही चळवळ धर्मचिकित्सा-व्यक्तिस्वातंत्र्याचा आदर-धर्मनिरपेक्ष समाजनिर्मिती या दिशेने जावी व त्याची परिणिती जातविरहित राष्ट्रनिर्मिती मध्ये व्हावी.
डॉ. नरेंद्र दाभोळकर यांना इतर छोट्या गोष्टींची आठवण झाली नाही. आडनांव हे जात ओळखण्याचे मुख्य साधन आहे. भारतामध्ये सर्वत्र जात हेच आडनाव असते. आता परिस्थिती बदलत आहे व निदान महाराष्ट्रात तरी आडनावावरून जात ओळखणे अवघड जाते. परंतु, लोकांना आता नवीन आडनावे सुद्धा माहित झालीत व त्या वरुन जातीचा अंदाज बांधला जातो. या करिता नाव वापरण्याची पद्धतच बदलली पाहिजे. नवीन पद्धतीत छत्रपति शिवाजी महाराजांचे नाव असे लिहले जाईल. शिवाजी जिजाबाई शहाजी. म्हणजेच प्रथम स्वतःचे नाव नंतर आईचे नाव व शेवटी वडिलांचे नाव. या पद्धति मुळे मुलीला लग्नानंतर नाव बदलण्याची आवश्यकताच राहणार नाही. हा एक जास्तीचा फायदा. या बद्दल अधिक माहिती येथे मिळेल.
(http://janahitwadi.blogspot.in/2011/03/standardisation-of-name-system.html ).
आणखी एका सोईचा फायदा घेतला पाहिजे. थी सोय म्हणजे आरक्षण. संकटाचे संधीत रुपांतर करण्याची हातोटी राजकारण्यांना उत्तम प्रकारे जमते. रा़जकारण्यानी आरक्षणाचा उपयोग जातीभेद मिटविण्या करता करावा. या मध्ये राजकारण्यांना व्यक्तिगत फायदा कदाचित होणार नाही. परंतु, देशाचा समाजाचा फायदा होईल. तेवढे तरी पुण्य कर्म करावे. त्यांनी आपली ताकद अयोग्य कामाकरिता वापरू नये. येथे पहा. (http://janahitwadi.blogspot.in/2012/02/blog-post.html) आरक्षणाच्या सोईचा कसा उपयोग करून घेता येईल (संकटाचे रुपांतर संधीत कसे करता येईल) ते येथे पहावे. (http://janahitwadi.blogspot.in/2011/04/is-it-possible-to-do-away-with-caste.html ) थोडक्यात सागावयाचे म्हणजे सध्या ज्यां जातीना आरक्षण आहे ते तसेच ठेवावे. फक्त व्यक्तिची जात पाहून आरक्षण देण्याऐवजी त्या व्यक्तीच्या आजी आजोबा पैकी एकाची (म्हणजे चौघापैकी कोणाचीही) जात पाहून आरक्षण द्यावे. जर आई-वडिलांची जात वेगळी असेल तसेच दोन्ही पैकी एक उच्च वर्णिय व जोडीदार अनुसुचित जाती/जमातीचा असेल तर अपत्याला कोठलाही धर्म अथवा जात लावू नये. बाकी सर्व विवाहित जोडप्यांच्या वडिलांची जात अपत्याला द्यावी. या प्रकारे निदान 200-300 वर्षांनी का होईना जात नष्ट होईल याची मला खात्री वाटते. देशाच्या आयुष्यात 200-300 वर्षे फार नाहीत. तसे पाहिले तर ही व्यवस्था काही हजार वर्षे अस्तित्वात आहे व जर काही उपाय योजले नाहीत तर कित्येक हजार वर्षे चालू राहिल. तेंव्हा जरी 200-300 वर्षे लागली तरी चिकाटीने हे करावेच लागेल.

Jana Hitwadi said...

@ माधव बामणे, मी वरील विचारात खालील गोष्टी जोडतो.

संकटाचे संधीत रुपांतर करण्याची हातोटी राजकारण्यांना उत्तम प्रकारे जमते. दुष्काळ हे सर्वसामान्यांना मोठे संकट वाटते. परंतु राजकारणी ते संकट न समजता संधी समजतात व त्याचे संधीत रुपांतर करतात. अशी कित्येक उदाहरणे देता येतील.

आपल्या पैकी कित्येकांना आरक्षणामुळे निरनिराळ्या संधी हुकल्या सारख्या वाटतात. ती निदान आपल्या अपत्याला तरी मिळावी या करिता ज्या व्यक्ंतिना आरक्षणाचा फायदा मिळू शकतो त्या पैकी एक व्यक्ती जोडीदार म्हणून निवडावी.

माधव बामणे said...

म्हणे धनगर आरक्षणाला मुहूर्त नाही!
आरक्षण म्हणजेच राखीव जागाकरिता भारतातील निरनिराळ्या प्रदेशात आंदोलने होत आहेत. महाराष्ट्रात मराठा व धनगर समाज, गुजरात मध्ये पाटीदार समाज राजस्थानात जाट समाज ही काही उदाहरणे आहेत. या आंदोलनांचा विचार करताना राज्यघटनेला काय अभिप्रेत आहे ते प्रथम समजून घेतले पाहिजे. त्यानंतर सर्वसमावेशक असा तोडगा काढला पाहिजे की, अशा आंदोलनानी निर्माण केलेल्या प्रश्नाचे उत्तर तर मिळेलच त्याच बरोबर भविष्यातील आंदोलनावरही तोडगा निघेल. १९ व्या शतकाच्या अखेरीस स्वामी विवेकानंदानी हिंदुस्थानातील सर्व समाज एकसंघ झाला पाहिजे असा विचार मांडला. स्वामीनी त्यावर उपायही सांगितला. तो म्हणजे सर्व अस्तित्वात असलेलेले सामाजिक थर समतल झाले पाहिजेत. याकरिता वरच्या थरांना खाली न ढकलता खालच्या थरांना वर घेतले पाहिजे. त्यावर शिक्षण हा उपाय त्यांनी सांगितला. अतुच्च थरातील विद्यार्थ्याला एक शिक्षक पुरेसा असेल तर नीच्यातील नीच थरातील विद्यार्थ्याला सहा शिक्षक लागतील असे सांगितले. माझ्यामते घटनेवर मार्क्सवादाचा प्रभाव आहे. भारताशिवाय इतरत्र कोठेही जातिव्यवस्था अस्तित्वात नसल्याने मार्क्सने सर्वांची संप्पत्ती सारखी करण्याचा साम्यवादचा विचार मांडला व तो पुष्कळ राष्ट्रात मान्य झाला. भारताच्या राज्यघटनेमध्ये या दोन्ही विचारांचा समावेश आहे. जर घटनेप्रमाणे सर्व झाले असते तर आतापर्यंत राखीव जागांची आवश्यकताच भासली नसती. परंतु, निरनिराळ्या क्लुप्त्या वापरुन घटनेचा उद्देश सफल न होण्याकरिताच प्रयत्न होत राहिले. त्यामुळे राज्यघटनेची ही तरतूद निष्फळ ठरली. राखीव जागांच्या तरतुदीचा उपयोग करूनच एक कायमस्वरुपाचा उपाय करता येईल. असा उपाय केला तर सध्याची आंदोलने बंद होतीलच वर भविष्यातही कोणी आंदोलन करणार नाही. ती तरतूद म्हणजे राखीव जागांचा निकष व्यक्तिच्या जातीऐवजी त्या व्यक्तीच्या आई-वडिल-दादा-दादी-नाना-नानी या पैकी निवडलेल्या कोणाही एकाच्या जातीवर ठरवावा. निवड स्वातंत्र्य दोन वेळा द्यावे. प्रथम अज्ञान असताना आई व सज्ञान झाल्यावर स्वतः ती व्यक्ति. अपत्याची जात ठरवताना त्याच्या आई-वडिलांची जात लक्षात घ्यावी. आई व वडिल दोघांची जात एकच असेल तर अपत्याची जात तीच समजावी. जर वेगळी असेल तर ते अपत्य फक्त भारतीय म्हणून ओळखले जावे. ते अपत्य सज्ञान झाल्यावर त्याला धर्म स्वीकारण्याचे स्वातंत्र्य असावे. जात स्वीकारण्याचे स्वातंत्र्य कोणालाही कधीही नसावे. सज्ञान व्यक्तिची ओळख स्वीकारलेला धर्म व भारतीय अशी असावी. समाजात हे बदल केले तर राखीव जागांचा प्रश्न कायमचा निकालात निघेलच वर भारत देश एकसंघ होईल. आप्पत्तीचे संधीत रुपांतर करण्यात वेळ दवडू नये.

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