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Saturday, 17 December 2011

Fundamental Reason for Corruption and Solution (भ्रष्टाचार का मूल और उपाय):



भ्रष्टाचारसे मुक्ती पाने के लिये भ्रष्टाचारीयों का खातमा करना याने कानून बना के भ्रष्टारीयों का सजा देना यह दूर का रास्ता है। ऐसी व्यवस्था निर्माण करनी चाहिये की, कोई भी व्यक्ती भ्रष्टाचार करनेसे दूर रहै। भ्रष्टाचार क्यों होता है वह जानकर उपाय ढूँढे। भ्रष्टाचार का मूल, व्यक्ती के लालच में है। सत्तासे पैसा मिलता है। हमारी धारणा है की, पैसेसे सब कुछ ख़रीदा जा सकता है। लोकशाही व्यवस्था में सत्ता चुनाव जीतनेसे मिलती है। इस लिये हर व्यक्ती चुनाव लड़कर सत्ता हासिल करना चाहता है। चुनाव में वोटरों को लालच दिख़ाकर उनसे वोट माँगता है। हम सभी जानते है की, गाँव में चुनाव जीतने के लिये प्रत्याशी लाखों रुपये खर्चा करते है। चुनाव जीतने के बाद कई गुना जादा पैसा कमाते है। जों प्रत्याशी पैसा ख़र्चा नही करते वह शायद ही जीतते है। मगर यदि जीत जाये तो जीतने के बाद पैसा ऐंठते नही। इसका मतलब साफ है। लालच़ का ख़ातमा और चुनाव का खर्चा शून्य करना। लालच़ का ख़ातमा करने के लिये धर्म का सहारा ले सकते है। धर्म के सच्चे साधु यह काम कर सकते है। मगर आज के ज़माने में ऐसे महात्मा मिलना कठीन ही नही नामुमक़ीन हो गया है। मगर हम चुनाव ख़र्च शून्य कर सकते है।


चुनाव का खर्चा शून्य करने के लिये सभी प्रत्याशिओं के प्रचार खर्च की जिम्मेवारी शासनने उठानी चाहिये। हर एक प्रत्याशी का समान प्रचार होना चाहिये। रेडिओ, टेलिव्हिजन, केबल, प्रचार सभा, पुस्तिका और कोई अन्य मार्गोंसे प्रचार किया जा सकता है। इस में एक रोड्ा यह हो सकता है कि, चुनाव लड़ने के लिये बहुत जादा प्रत्याशी मैदान में उतरेंगे। यह भीड़ कम करने के लिये चुनाव लड़ने के लिये कुछ नियम बनाने होंगे। मेरे विचार से आगे दिये वाले या और नियम बंधनकारक होने चाहिये। शिक्षा (याने कीे कम से कम 9 वी उत्तीर्ण), अनुभव (याने की 5 से 15 साल का समाज कार्य का अनुभव), निष्ठा (याने की चुनाव दिन के पहले कम से कम 6 साल एक ही राजनीती पक्ष में या अपक्ष होना), बच्चे (याने की जिसे दो या कम बच्चे है उसे चुनाव के दिन दो से जादा बच्चे नही होना ओर जिसे दो या जादा बच्चे है उसे उस से जादा बच्चे नही होना अनिवार्य किया जाय), स्वच्छता (याने की घर में स्वच्छतागृह होना)। इस में और भी निकष डाल सकते है या इन में सुधार भी कर सकते है। यदी ऐसे नियम बने तो प्रत्याशीं जादा नही होंगे।
यह उपाय साफ़ स्वच्छ प्रत्याशी दे सकते है। मगर सत्ता ऐसी बला है की, भले भले कों भ्रष्ट कर सकती है। हमारे प्रधानमंत्री भ्रष्ट नही है। मगर अपनी खुर्ची सही सलामत रखने के लिये उन्हे कुछ लोगों को खूष रखना पडता है। इस लिये चुनाव जीतने के बाद भी जीतने वालों के लिये नियम होना चाहिये। यह नियम ऐसे हो सकते है चुनाव के पहले अपनी संपत्ती का उचित ब्योरा दें (यह सक्षम अधिकारीसे जाँच करने के बाद ही सच्चा मान लिया जाय (उस की हर 6 महिने में फिरसे जाँच की जाय और जनता को वेबसाईट के जरीये दिखाया जाय)। शासन के कर्मचारिओं को जबभी जबभी संपत्ती में बदलाव आ जाता है तो वह घोषित करना अनिवार्य है। जनप्रतिनिधो को भी यह कानून अनिवार्य करना चाहिये ओर उस का ब्योरा वेबसाईट के जरीये जनता तक पहँुचाना चाहिये।
लोकशाही व्यवस्था में जादा से जादा वोट लेनेवाला विजयी घोषित किया जाता है। भारत में चुनाव में वोट डालने वालों की औसत 50 फी सदी है। यह अनुभव है कि, 15 प्रतिशत वोट मिलनेवाला विजयी घोषित किया जाता है। यह 15 प्रतिशत लोगों का लाडला (या लाडली) 100 प्रतिशत वोटरों की पसंद माना जाता है। उसे जनता का प्रतिनिधी माना जाता है। मैं लोकतंत्र का यह अपमान समझता हूँ। 100 प्रतिशत वोट ले के जीतना नामुमकीन है, यह मैं मानता हँू। मगर जैसे विद्यार्थी को परिक्षा उत्तीर्ण होने के लिये 35 से लेकर 50 प्रतिशत तक का बंधन होता है वैसाही बंधन चुनाव जीतने के लिये भी होना चाहिये। 50 प्रतिशत मर्यादा अच्छी होगी। जनताने इसपर गौर कर के निर्णय लेना चाहिये। जो भी निर्णय होगा उस के लिये 100 प्रतिशत वोटिंग होना जरुरी है। इस लिये जनता के लिये वोटिंग अनिवार्य करना होगा। इस के साथ यदि कोई वोटर सोचता है कि चुनाव लड़नेवालो में कोई भी प्रत्याशी लायक नही है तो उसे "कोई लायक नही" यह कहने का अधिकार होना चाहिये। प्रत्याशिओं की यादी (लिस्ट) में इस नाम का यह प्रत्याशी शासनने जोड़ना चाहिये। यदी इस प्रत्याशी को बहुमत मिलता है तो बाकी सभी प्रत्याशी को 6 साल तक कोईभी चुनाव लढ़ने के लिये परवानगी (परमिशन) नही होनी चाहिये। याने बाकी सब प्रत्याशी 6 साल तक चुनाव में शामिल नही होंगे।
जनता को भी कुछ नियम अनिवार्य है। इन नियमों के दायरे में जनता याने आम आदमी और चुने हुये जनप्रतिनिधी दोनो आने चाहिये। चलनी नोट 50 रुपये तक सीमित रखी जाय (वर्तमान में जिसके पास 100, 500 ऐर 1000 के नोट हो तो हर व्यक्तीने सभी नोटोंपर दस्तख़त कर के खुद के बैंक खाते में जमा करना अनिवार्य करें। बैक सभी नोटोंपर खाता क्रमांक ड़ाल के स्वीकार करे और उस की जाँच बाद में कर के व्यक्ती के खाते में जमा करे। इस की जानकारी सक्षम आयकर अधिकारी को देना बैंक के लिये अनिवार्य होगा। यदी यह धन काला हो तो पूरी राशी शासन के खाते में जमा कर दे)। सामान्य व्यक्ती को बैंक में खाता खोलना मुष्किल है। खाते में कम से कम 1 हजार या जादा रक्कम रखने का नियम जो है। यह मुष्किल सुलझाने के लिये शून्य बचत खाता जारी करना होगा। इस नियसे हर 16 साल के उपर के व्यक्ती को बैंक में खाता खोलना आसान होगा। बैंक खाता होनेसे रोकड़ व्यवहार करीब करीब बंद कर के सिर्फ धनादेश (चेक) द्वारा व्यवहार कर सकते है। यह सुविधा देने के लिये संगणक प्रणाली (कम्प्युटर प्रोग्राम) विकसित करना होगा। ऐसी प्रणाली हो जिस में हर जगह मशीन होगी जो देनेवाले का खाता जाँच के तय करेगी की, खाते में देने के लिये पैसा है या नही। यदी पैसा हो तो फिर दुसरा दस्तख़त कर के लेन-देन पुरी की जायेगी। पैसा जिस की मशीन (यंत्र) हो उसी के खाते  में जमा होगा। जिस के खाते में पैसा जमा होगा उस के खातेसे 1-2 (जो भी तय होगा) फी सदी रक्कम कर के रुप में शासन के खाते में जमा होगी। इस प्रकार रोकड की आवश्यकता ही नही होगी। कुछ मर्यादा तक (याने 100-200 रुपये तक) रोकड़ व्यवहार को मान्यता दे सकते है। बैंक को जो कर जमा होगा उस में तय की हुई रक्कम लेन-देन के लिये दी जाय। बड़ी कीम़त का चलन नही होने से काला पैसा छुपा के रखना असंभव होगा।
जो भी नियम बनाये जाये उन का जारी करने का समय निश्चित किया जाय। और भी उपाय आवश्यक होंगे। सोच के बाद ऐसे उपाय इस में जोड दिये जाय। निवेदनपर दस्तख़त करने के लिये इधर क्लिक कीजिये।

1 comment:

Jana said...

Reserve Bank of India has issued directives to all scheduled commercial bank to make available Zero balance account named as Basic Bank Account to every one. The account shall have facility for Debit cum ATM card at no extra charges. Therefore every eligible person can have a bank account in near future. This is the first step towards eradication of corruption in public life. I had suggested this in my article @ http://janahitwadi.blogspot.in/2011/01/new-bank-accounts.html
Now there is a need the citizens press their demand for other bank accounts. Social workers and leaders can take up this issue and succeed.

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